
धमतरी/नगरी जिले की पाँचवीं अनुसूचित क्षेत्र नगरी में आदिवासी भूमि संरक्षण कानून अब सवालों के घेरे में नहीं, बल्कि राजस्व विभाग की अलमारियों में कैद नजर आ रहा है। कलेक्टर और आयुक्त जैसे संवैधानिक पदों के स्पष्ट आदेशों के बावजूद एक आदिवासी की बहुमूल्य भूमि आज भी गैर-आदिवासी के नाम दर्ज है। यह स्थिति किसी तकनीकी भूल से ज्यादा संगठित प्रशासनिक हेराफेरी की ओर इशारा करती है। जब आदेश भी हार जाएं और रिकॉर्ड जीत जाएं। इस पूरे प्रकरण में सबसे गंभीर तथ्य यह है कि, कलेक्टर ने स्वयं अपने नामांतरण आदेश को निरस्त किया, आयुक्त ने कलेक्टर के फैसले पर मुहर लगाई, इसके बावजूद 2011 में राजस्व रिकॉर्ड को “अदृश्य हाथों” ने फिर बदल दिया
सवाल यह नहीं कि गलती हुई, सवाल यह है कि गलती दोबारा किसके आदेश से करवाई गई ?
नौकरी का झांसा,जमीन पर कब्जा — और फाइलों का खेल
आरोप है कि एक गैर-आदिवासी ने नौकरी का लालच देकर एक आदिवासी युवक का विश्वास जीता और उसकी कीमती कृषि भूमि को पहले कागजों में घुमाया, फिर नामांतरण के जरिए अपने नियंत्रण में ले लिया। जब मामला खुला तो आदेश रद्द हुए, लेकिन रिकॉर्ड कभी सुधरे ही नहीं। क्या यह केवल लापरवाही है या,तहसील, उप-पंजीयक, राजस्व निरीक्षक, रिकॉर्ड शाखा,सभी की सुनियोजित चुप्पी, सबसे विस्फोटक सवाल यही है।
जब कलेक्टर और आयुक्त दोनों के आदेश मौजूद थे, तब 2011 में रिकॉर्ड “पूर्ववत” करने की आड़ में किस आदेश के आधार पर? किस अधिकारी के हस्ताक्षर से?गैर-आदिवासी का नाम दोबारा कैसे दर्ज हुआ। यदि इसका जवाब राजस्व विभाग के पास नहीं है, तो यह अयोग्यता नहीं, मिलीभगत मानी जाएगी।
कानून कागज पर, जमीन ताकतवरों के पास
विशेषज्ञों का मानना है कि पाँचवीं अनुसूचित क्षेत्र में आदिवासी भूमि का गैर-आदिवासी को हस्तांतरण संविधान और राज्य कानूनों का सीधा उल्लंघन है। इसके बावजूद यदि रिकॉर्ड में ऐसा नाम बना रहता है, तो यह संदेश जाता है कि कानून कमजोर है और सिस्टम ताकतवरों के साथ खड़ा है स्थानीय सर्व आदिवासी समाज और सामाजिक संगठनों ने इसे“प्रशासनिक संरक्षण में जमीन हड़पने का मॉडल” बताया है।संगठनों का कहना है कि यदि राजस्व अमला ईमानदार होता, तो न रजिस्ट्री होती, न नामांतरण, और न ही 2011 का रिकॉर्ड खेल।
स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने स्पष्ट किया है कि पूरे मामले की उच्च स्तरीय न्यायिक या एसआईटी जांच हो,2011 में रिकॉर्ड बदलने वाले हर अधिकारी–कर्मचारी की पहचान की जाए,फर्जी रजिस्ट्री तत्काल निरस्त कर भूमि मूल आदिवासी को लौटाई जाए,राजस्व विभाग में विशेष ऑडिट और डिजिटल ट्रैकिंग अनिवार्य की जाए। यदि इस मामले में कठोर और सार्वजनिक कार्रवाई नहीं हुई, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि पाँचवीं अनुसूचित क्षेत्र में कानून नहीं, फाइलें और प्रभावशाली लोग शासन चला रहे हैं। ऐसे में आदिवासी भूमि संरक्षण सिर्फ सरकारी पुस्तिकाओं तक सिमट कर रह जाएगा।





